बिटिया की कहानी
पूछा मैंने एक दिन एक एक चुपचाप सी बैठी बिटिया से
क्या किसी ने जुदा कर दिया उसे उसकी गुडिया से
उस बिटिया ने बोला कुछ यूं बंद बंद जुंबा में मुझसेक्या तू नहीं जानता क्या है इज्ज़त मेरी इस जहाँ मे
रह गया थोडा शहम सा मै सुन कर उसकी यह जुबानी
शायद उसने दबा रखी थी न जाने कितनी कहानी
एक धक्का सा लगा मेरे दिल के एक हिस्से को सुन कर उसकी इस किस्से को
चाहा तो मैंने दिल से उसे वापस लोटाना उसकी जिन्दगी के उस हिस्से को
पर अफसोस लोटा न सका बिटिया को उस हिस्से को
कोशिश तो की मैंने बहुत उसको समझाने की पर एक न मानी
अंत में उसने मुझसे कहा क्या तो मिटा सकता हे बिटिया को अभिशाप समझने की रवानी को
आज क्या हम भूल जायेंगे बिटिया के इस क़ुरबानी को
तो हमें प्रण लेना है आज की मिटा देंगे हम एक दिन दुनिया से इस रवानी को
और कुर्बान न होने देंगे हम यूँ ही और बिटियों की को .