Wednesday, 10 July 2013

                                                              बिटिया  की  कहानी    

 

पूछा मैंने  एक दिन एक एक चुपचाप सी बैठी बिटिया से 
                     क्या किसी ने जुदा कर दिया उसे उसकी गुडिया से
उस बिटिया ने बोला  कुछ यूं  बंद  बंद  जुंबा  में मुझसे
                   क्या  तू  नहीं  जानता  क्या है  इज्ज़त  मेरी  इस जहाँ मे
रह गया थोडा शहम सा मै  सुन कर उसकी यह जुबानी
                   शायद उसने दबा  रखी थी न जाने कितनी  कहानी
एक धक्का सा लगा मेरे दिल के एक हिस्से को सुन कर  उसकी इस किस्से  को
                     चाहा तो मैंने दिल से उसे वापस लोटाना उसकी जिन्दगी के उस हिस्से को
पर अफसोस लोटा न सका बिटिया को उस हिस्से को
                   कोशिश तो की मैंने बहुत उसको समझाने  की पर एक न मानी
अंत में उसने मुझसे कहा क्या तो मिटा सकता  हे बिटिया को अभिशाप  समझने की रवानी को
                  आज क्या हम भूल जायेंगे  बिटिया के इस  क़ुरबानी को
तो हमें प्रण लेना  है आज की मिटा देंगे हम एक दिन दुनिया से इस रवानी  को
                   और कुर्बान न होने देंगे हम यूँ ही और बिटियों की  को .